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जैविक कीटनाशक-जैविक कीटनाशक कैसे बनाएं

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ज्यादातर किसान अपनी फसलों में लगने वाले कीटों से बचाव के लिए रसायनिक कीटनाशक व दवाओं का इस्तेमाल करते हैं, जो न सिर्फ वातावरण को बल्कि हमारी सेहत को भी नुकसान पहुंचाता है। लेकिन अगर किसान इसकी जगह पर जैविक कीटनाशक और दवाओं को इस्तेमाल करें तो इससे न सिर्फ पर्यावरण और हमारी सेहत पर अच्छा असर पड़ेगा बल्कि किसान का पैसा भी बचेगा, क्योंकि किसान इसे खुद ही अपने घर में आसानी से तैयार कर सकते हैं।

फलदार पौधों के लिए अगर कीटनाशक तैयार करना है तो इन तरीके से बना सकते हैं

आवश्यक सामग्री-

  • 20 लीटर किसी भी देसी गाय का मूत्र चाहिए।
  • 20 लीटर मूत्र में लगभग ढार्इ किलो ( आधा किलो कम या ज्यादा हो सकता है ) नीम की पत्ती या निम्बोली को पीसकर उसकी चटनी मिलाइए।
  • इसी तरह से एक दूसरा पत्ता होता है धतूरे का पत्ता। लगभग ढार्इ किलो धतूरे के पत्ते की चटनी मिलाइए उसमें।
  • एक पेड़ होता है जिसको आक या आँकड़ा कहते हैं, अर्कमदार कहते हैं आयुर्वेद में। इसके भी पत्ते लगभग ढार्इ किलो लेकर इसकी चटनी बनाकर मिलाए।
  • बेलपत्री , जिसके पत्ते आप शंकर भगवान के उपर चढ़ाते हैं । बेलपत्री या विल्वपत्रा के पते की ढार्इ किलो की चटनी मिलाए उसमें।
  • आधा किलो से 750 ग्राम तक तम्बाकू का पाऊडर और डाल देना। इसमें 1 किलो लाल मिर्च का पाऊडर भी डाल दें

बनाने की विधि

ये पांच-छह तरह के पेड़ों के पत्ते आप ढार्इ- ढार्इ किलो ले लो
इनको पीसकर 20 लीटर देसी गाय का मूत्र में डालकर उबालना हैं, उबालकर इसको ठंडा कर लेना है और ठंडा करके छानकर प्लास्टिक के ड्रम में भर ले| ये कभी भी खराब नहीं होता। ये कीटनाशक तैयार हो गया।

उपयोग करने की विधि

अब इसको डालना कैसे है?

फलदार पौधों में जितना कीटनाशक लेंगे उसका 15 गुना पानी मिलाएं। अगर एक लीटर कीटनाशक लिया तो 15 लीटर पानी|जितना कीटनाशक आपका तैयार हो, उसका अंदाजा लगा लीजिए आप, उसका 15गुना पानी मिला दीजिए। 15 लीटर पानी में 1 लीटर कितना से मिलाकर पूरे पौधे पर स्प्रे करना चाहिए

इसको छिड़कने का परिणाम ये है कि दो से तीन दिन के अंदर जिस फसल पर आपने स्प्रै किया, उस पर कीट और जंतु आपको दिखार्इ नहीं देगें, कीड़े और जंतु सब पूरी तरह से दो-तीन दिन में ही खत्म हो जाते हैं, समाप्त हो जाते हैं। इतना प्रभावशाली ये कीटनाशक बनकर तैयार होता है। ये बड़ी-बड़ी विदेशी कम्पनियों के कीटनाशक से सैकड़ों गुणा ज्यादा ताकतवर है और एकदम फोकट का है, बनाने में कोर्इ खर्चा नहीं । देसी गौमाता का मूत्र मुफ्त में मिल जाता है, नीम के पत्ते, निम्बोली, आक के पत्ते, आडू के पत्ते- सब तरह के पत्ते मुफ्त में हर गाँव में उपलब्ध हैं। तो ये आप कीटनाशक के रूप में, जंतुनाशक के रूप में आप इस्तेमाल करें ।

जैविक कीटनाशकों से लाभ

  • जीवों एवं वनस्पतियों पर आधारित उत्पाद होने के कारण, जैविक कीटनाशक लगभग एक माह में भूमि में मिलकर अपघटित हो जाते है तथा इनका कोई भी अंश अवशेष नही रहता | यही कारण है इन्हें परिस्तिथतकीय मित्र के रूप में जाना जाता है |
  • जैविक कीटनाशक केवल लक्षित कीटों एवं बिमारियों को मारते है जब की कीटनाशक से मित्र कीट भी नष्ट हो जाते है |
  • जैविक कीटनाशकों के प्रयोग से कीटों/व्याधियों में सहनशीलता एवं प्रतिरोध नही उत्पन्न होता जबकि अनेक रसायन कीटनाशकों के प्रयोग से कीटों में प्रतिरोध क्षमता उत्पन्न होती जा रही है जिनके कारण उनका प्रयोग अनुपयोगी होता जा रहा है |
  • जैविक कीटनाशकों के प्रयोग से कीटों के जैविक स्वभाव में कोई परिवर्तन नही होता जबकि रासायनिक कीटनाशकों के प्रयोग से ऐसे लक्षण परिलक्षित हुए है | सफ़ेद मक्खी अब अनेक फसलों तथा चने का छेदक अब कई अन्य फसलों को भी नुकसान पहुँचाने लगा है |
  • जैविक कीटनाशकों के प्रयोग के तुरंत बाद फलियों, फलों, सब्जियों की कटाई कर प्रयोग में लाया जा सकता है जबकि रासायिनक कीटनाशकों के अवशिष्ट प्रभाव को कम करने के लिए कुछ दिनों की प्रतीक्षा करनी पड़ती है |
  • जैविक कीटनाशकों के सुरक्षित, हानिरहित तथा परिस्तिथतकीय मित्र होने के कारण विश्व में इनके प्रयोग से उत्पादित चाय, कपास, फल, सब्जियां, तम्बाकू तथा खद्ध्यानो, दलहन एवं तिलहन की मांग एवं मूल्यों में वृद्धि हो रही है, जिसका परिणाम यह है की कृषकों को उनके उत्पादों का अधिक मूल्य मिल रहा है |
  • जैविक कीटनाशकों के विषहीन एवं हानिरहित होने के कारण ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्रों में इनके प्रयोग से आत्महत्या की सम्भावना शून्य हो गयी है जबकि कीटनाशी रसायनों से अनेक आत्म हत्यांए हो रही है |
  • जैविक कीटनाशक पर्यावरण, मनुष्य एवं पशुओं के लिए सुरक्षित तथा हानिरहित है | इनके प्रयोग से जैविक खेती को बढ़ावा मिलता है जो पर्यावरण एवं परिस्तिथतकीय का संतुलन बनाये रखने में सहायक है |

 

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