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Saturday, September 18, 2021
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अमरूद की खेती

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आम जानकारी

यह भारत में आम उगाई जाने वाली, पर व्यापारिक फसल है। इसका जन्म केंद्रीय अमेरिका में हुआ है। इसे उष्णकटिबंधीय और उप- उष्णकटिबंधीय इलाकों में उगाया जाता है। इसमें विटामिन सी और पैक्टिन के साथ साथ कैल्शियम और फासफोरस भी अधिक मात्रा में पाया जाता है। यह भारत की आम, केला और निंबू जाति के बूटों के बाद उगाई जाने वाली चौथे नंबर की फसल है। इसकी पैदावार पूरे भारत में की जाती है। बिहार, उत्तर प्रदेश, महांराष्ट्र, कर्नाटक, उड़ीसा, पश्चिमी बंगाल, आंध्र प्रदेश और तामिलनाडू के इलावा इसकी खेती पंजाब और हरियाणा में भी की जाती है। पंजाब में 8022 हैक्टेयर के रकबे पर अमरूद की खेती की जाती है और औसतन पैदावार 160463 मैट्रिक टन होती है।

मिट्टी-यह सख्त किस्म की फसल है और इसकी पैदावार के लिए हर तरह की मिट्टी अनुकूल होती है, जिसमें हल्की से लेकर भारी और कम निकास वाली मिट्टी भी शामिल है। इसकी पैदावार 5.5 से 7.5 पी एच वाली मिट्टी में भी की जा सकती है। अच्छी पैदावार के लिए इसे गहरे तल, अच्छे निकास वाली रेतली मिट्टी से लेकर चिकनी मिट्टी में बीजना चाहिए|

प्रसिद्ध किस्में और पैदावार-

Sardar: इसे एल 49 के नाम से भी जाना जाता है। यह छोटे कद वाली किस्म है, जिसकी टहनियां काफी घनी और फैली हुई होती हैं। इसका फल बड़े आकार और बाहर से खुरदुरा जैसा होता है। इसका गुद्दा क्रीम रंग का होता है। खाने को यह नर्म, रसीला और स्वादिष्ट होता है। इसमें टी एस एस की मात्रा 10 से 12 प्रतिशत होती है। इसकी प्रति बूटा पैदावार 130 से 155 किलोग्राम तक होती है।

VNR BIHI-यह अमरूद की हाइब्रिड किस्में इसके अंदर उत्पादन 1 साल में ही शुरू हो जाता है और एक फल का औसत वजन 800 ग्राम से डेढ़ kg तक होता है

जमीन की तैयारी- खेत की दो बार  जोताई करें और फिर समतल करें। खेत को इस तरह तैयार करे कि उसमें पानी ना खड़ा रहे। इससे खरपतवार का नियंत्रण हो जाता है

बिजाई का समय

फरवरी-मार्च या जुलाई-सितंबर का महीना अमरूद के पौधे लगाने के लिए सही माना जाता है।

फासला -एक पौधे से दूसरे पौधे तथा एक पंक्ति से दूसरी पंक्ति के बीच की दूरी 10 *10 फीट होनी चाहिए

खाद –

कटाई और छंटाई – पौधों की मजबूती और सही वृद्धि के लिए कटाई और छंटाई की जरूरत होती है। जितना मजबूत बूटे का तना होगा, उतनी ही पैदावार अधिक अच्छी गुणवत्ता भरपूर होगी। बूटे की उपजाई क्षमता बनाए रखने के लिए फलों की पहली तुड़ाई के बाद बूटे की हल्की छंटाई करनी जरूरी है। जब कि सूख चुकी और बीमारी आदि से प्रभावित टहनियों की कटाई लगातार करनी चाहिए। बूटे की कटाई हमेशा नीचे से ऊपर की तरफ करनी चाहिए। अमरूद के बूटे को फूल, टहनियां और तने की स्थिति के अनुसार पड़ते हैं इसलिए साल में एक बार पौधे की हल्की छंटाई करने के समय टहनियों के ऊपर वाले हिस्से को 10 सैं.मी. तक काट देना चाहिए। इस तरह कटाई के बाद नईं टहनियां अकुंरन में सहायता मिलती है।

अंतर-फसलें-

अमरूद के बाग में पहले 3 से 4 वर्ष के दौरान मूली, भिंडी, बैंगन और गाजर की फसल उगाई जा सकती है। इसके इलावा फलीदार फसलें जैसे चने, फलियां आदि भी उगाई जा सकती हैं।

खरपतवार नियंत्रण – पौधे के अच्छे विकास के लिए समय-समय पर पौधे से खरपतवार को हटाते रहे

सिंचाई – पौधे में सिंचाई बहुत ही आवश्यक होती है नया पौधा जमीन में लगाने के पश्चात 2 से 3 दिन के अंतराल पर सिंचाई करनी चाहिए तथा जब पौधा 5 से 6 महीने का हो जाता है तो 7 से 8 दिन के अंतराल पर सिंचाई करनी चाहिए बड़ा पौधा होने पर 15 से 20 दिन के अंतराल पर सिंचाई करनी चाहिए| जब पौधे में फ्लोरिंग स्टेज रहती है तब पानी बिल्कुल ही बंद कर देना चाहिए

हानिकारक कीट और रोकथाम

फल की मक्खी : यह अमरूद का गंभीर कीट है। मादा मक्खी नए फलों के अंदर अंडे देती है। उसके बाद नए कीट फल के गुद्दे को खाते हैं जिससे फल गलना शुरू हो जाता है और गिर जाता है।

 

यदि बाग में फल की मक्खी का हमला पहले भी होता है तो बारिश के मौसम में फसल को ना बोयें। समय पर तुड़ाई करें। तुड़ाई में देरी ना करें। प्रभावित शाखाओं और फलों को खेत में से बाहर निकालें और नष्ट कर दें। फैनवेलरेट 80 मि.ली को 150 लीटर पानी में मिलाकर फल पकने पर सप्ताह के अंतराल पर स्प्रे करें। फैनवेलरेट की स्प्रे के बाद तीसरे दिन फल की तुड़ाई करें।

मिली बग : ये पौधे के विभिन्न भागों में से रस चूसते हैं जिससे पौधा कमज़ोर हो जाता है। यदि रस चूसने वाले कीटों का हमला दिखे तो क्लोरपाइरीफॉस 50 ई सी 300 मि.ली. को 100 लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें।

अमरूद का शाख का कीट

अमरूद का शाख का कीट : यह नर्सरी का गंभीर कीट है। प्रभावित टहनी सूख जाती है।
यदि इसका हमला दिखे तो क्लोरपाइरीफॉस 500 मि.ली. या क्विनलफॉस 400 मि.ली. को 100 लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें।
चेपा

चेपा : यह अमरूद का गंभीर और आम कीट है। प्रौढ़ और छोटे कीट पौधे में से रस चूसकर उसे कमज़ोर कर देते हैं। गंभीर हमले के कारण पत्ते मुड़ जाते हैं जिससे उनका आकार खराब हो जाता है। ये शहद की बूंद जैसा पदार्थ  छोड़ते हैं। जिससे प्रभावित पत्ते पर काले रंग की फंगस विकसित हो जाती है।
यदि इसका हमला दिखे तो डाइमैथोएट 20 मि.ली. या मिथाइल डेमेटान 20 मि.ली. का प्रति 10 लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें।
सूखाबीमारियां और रोकथाम
सूखा : यह अमरूद के पौधे को लगने वाली खतरनाक बीमारी है। इसका हमला होने पर बूटे के पत्ते पीले पड़ने और मुरझाने शुरू हो जाते हैं। हमला ज्यादा होने पर पत्ते गिर भी जाते हैं।
इसकी रोकथाम के लिए खेत में पानी इकट्ठा ना होने दें। प्रभावित पौधों को निकालें और दूर ले जाकर नष्ट कर दें। कॉपर ऑक्सीक्लोराइड 25 ग्राम या कार्बेनडाज़िम 20 ग्राम को 10 लीटर पानी में मिलाकर मिट्टी के नज़दीक छिड़कें।
एंथ्राक्नोस या मुरझाना

एंथ्राक्नोस या मुरझाना : टहनियों पर गहरे भूरे या काले रंग के धब्बे पड़ जाते हैं। फलों पर छोटे, गहरे रंग के धब्बे पड़ जाते हैं। संक्रमण के कारण 2 से 3 दिनों में फल गलना शुरू हो जाता है।
खेत को साफ रखें, प्रभावित पौधे के भागों और फलों को नष्ट करें। खेत में पानी ना खड़ा होने दें। छंटाई के बाद कप्तान 300 ग्राम को 100 लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें। फल बनने के बाद कप्तान की दोबारा स्प्रे करें और 10-15 दिनों के अंतराल पर फल पकने तक स्प्रे करें। यदि इसका हमला खेत में दिखे तो कॉपर ऑक्सीक्लोराईड 30 ग्राम को 10 लीटर पानी में मिलाकर प्रभावित वृक्ष पर स्प्रे करें।
फसल की कटाई –
बिजाई के 2-3 साल बाद अमरूद के बूटों को फल लगने शुरू हो जाते हैं। फलों के पूरी तरह पकने के बाद इनकी तुड़ाई करनी चाहिए। पूरी तरह पकने के बाद फलों का रंग हरे से पीला होना शुरू हो जाता है। फलों की तुड़ाई सही समय पर कर लेनी चाहिए। फलों को ज्यादा पकने नहीं देना चाहिए, क्योंकि ज्यादा पकने से फलों के स्वाद और गुणवत्ता प्रभावित होती है।
कटाई के बाद –
                फलों की तुड़ाई करें। इसके बाद फलों को साफ करें, उन्हें आकार के आधार पर बांटे और पैक कर लें। अमरूद जल्दी खराब होने वाला फल है। इसलिए इसे तुड़ाई के तुरंत बाद बाजार में बेचने के लिए भेज देना चाहिए। इसे पैक करने के लिए कार्टून फाइबर बॉक्स या अलग अलग आकार के गत्ते के डिब्बे या बांस की टोकरियों का प्रयोग करना चाहिए।

 

 

जैविक कवकनाशी कैसे बनाएं

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पौधों को फंगस से बचाने के लिए तथा उनके तने को रोगों से बचाने के लिए हम जैविक फंजीसाइड का इस्तेमाल करते हैं इसको हमने 1 तरीके से बना सकते हैं

फंगीसाइड बनाने का तरीका-

आवश्यक सामग्री-

1-नीला थोथा (किसान भाइयों यह है आपको पंसारी की दुकान पर मिलेगा)

2-बुझा हुआ चुना

इन दोनों को 15 लीटर पानी में 30 ग्राम मिलाकर इसको 1 घंटे तक रखना है उसके बाद में इसको कपड़े से छानकर पौधे के ऊपर हर 3 महीने से स्प्रे करना है

अधिक जानकारी के लिए आप हमसे संपर्क कर सकते हैं-8949619262

 

 

 

 

जैविक कीटनाशक बनाने का तरीका

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ज्यादा तर किसान अपनी फसलों में लगने वाले कीटों से बचाव के लिए राशायनिक कीटनाशक व दवाओं का इस्तेमाल करते हैं, जो न सिर्फ वातावरण को बल्कि हमारी सेहत को भी नुकसान पहुंचाता है। लेकिन अगर किसान इसकी जगह पर जैविक कीटनाशक और दवाओं को इस्तेमाल करें तो इससे न सिर्फ पर्यावरण और हमारी सेहत पर अच्छा असर पड़ेगा बल्कि किसान का पैसा भी बचेगा, क्योंकि किसान इसे खुद ही अपने घर में आसानी से तैयार कर सकते हैं।

कीटनाशक बनाने के लिए आवश्यक सामग्री-

20-लीटर गौमुत्र

2.5 kg-नीम के पत्ते

2.5kg -आक‌ के पत्ते

2.5 kg-धतुरा के पत्ते

500gm- तम्बाकू

500gm- लाल मिर्च,

नोट-किसान भाई इसको अपनी आवश्यकता के अनुसार घटा और बड़ा भी सकते हैं

 

20 लीटर गोमूत्र में इन सब सामग्री को मिलाकर हल्की आंच में 10 से 12 घंटे तक उबालें या इन को किसी ड्रम में डालकर 10 से 12 दिन तक सङाऐ जब यह अच्छे तरीके से सड़ जाए तो इसको छानकर किसी अन्य ड्रम में रख ले

सपरे करने का तरीका- 15 लीटर पानी में 1 लीटर कीटनाशक मिलाकर मिलाकर हर 10 दिन से पौधे के ऊपर स्प्रे करें इससे हानिकारक कीट पौधे पर नहीं आएंगे और फंगस का कंट्रोल भी होगा

यह विधि सबसे आसान और सबसे कारगर है किसान भाई इसको अपनाकर अपने खर्चे कम कर सकता है

हर्बल खाद बनाने की विधि

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हर्बल खाद को हम गड्ढा खाद भी कहते हैं इसके अंदर हम 5 फीट गहरा 5 फीट चौड़ा और 10 फीट लंबे आकार के तीन से चार गड्ढे ( अपनी आवश्यकतानुसार ) कर लेते हैं

फिर इसके अंदर आधे फिट तक नीम आग धतूरा के पत्ते या टहनियों को बारीक काटकर गड्ढे में चारों तरफ फैला देते हैं उसके बाद में उसके ऊपर 2 फीट तक गोबर बिछा देते हैं फिर वापस नेम आग धतूरा लगाकर गोबर डाल देते हैं जब गड्ढा पूर्णतया भर जाए तो उसमें एक बार फुल पानी लगा कर उसको मिट्टी से बंद कर देना चाहिए ऊपर और यह खाद 4 से 5 महीने के भीतर तैयार हो जाती है फिर इसको हम पौधे की आवश्यकता के अनुसार पौधे में डाल सकते हैंंगड्ढा विधि के लाभ – गड्ढे में खाद तैयार करने से जो भी पोषक तत्व रहते हैं वह पानी के साथ बहकर कहीं नहीं जाते हैं

गड्ढे में खाद तैयार करने से खरपतवार के बीज नष्ट हो जाते हैं जिससे भूमि पर खरपतवार कम उगते हैं

गड्ढा विधि तैयार खाद को पौधे में डालने पर पौधे की उचित वृद्धि होती है

गड्ढा विधि से तैयार खाद में जमीनी रोग कम लगते हैं और दिमाग से भी बचाव होता है

 

 

जीवामृत बनाने की पूरी विधि

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किसान अपनी आमदनी को बढ़ाने के लिये ये काम करना जरुरी हे वह अपनी फसल की लागत को कम कर सकते हे भाव हमेशा किसान के ऊपर निर्भर नहीं करता हे

 

अब भाव बढ़ना और कम होना किसान के हाथ में नहीं हे इसके लिये किसान को अपनी लागत कम करनी होगी किसान अपनी लागत को जैविक खेती की सहायता से ही कम कर सकते हैं

जीवामृत बहुत अधिक गुणवत्ता और पोषण वाला खाद होता हे यह पोधो के विकास और उत्पादन में बहुत ही अधिक महत्वपूर्ण खाद होता हे इसे गोबर , गोमूत्र , गुड़  को मिक्स करके बनाया जाता हे

 

इसके उपयोग से अत्यधिक उत्पादन मिलता हे किसान भाई इसे बहुत ही आसानी से कम खरच में अपने खेत पर ही तैयार कर सकते हे यह पौधे के बहुत से रोगो में रोकथाम करता हे

इसमें कुछ ग्राम में ही करोडो की संख्या में जीवाणु होते हे जीवामृत जैविक खेती का सबसे महत्वपूर्ण भाग हे जिसके कारण जैविक खेती में हम बहुत अच्छा उत्पादन कर सकते हे

जीवामृत को बनाने के लिए आवश्यक सामग्री जिनकी हमें आवश्यकता है

200 लीटर  पानी का डर्म ( ढोल )

10 किलो देशी गाय का ताजा गोबर ( किसी भी देशी किस्म की गाय का गोबर )

10 किलो गाय का ताजा गोमूत्र

2 किलो पुराना देशी गुड़

2 किलो दाल का आटा या बेसन ( जो किसी भी दाल मुंग उड़द चना अरहर का ले सकते हे

 

किसान इन सब चीजों को इकट्ठा करके एक जगह रख ले सबसे पहले किसान पानी का डर्म ले पानी के ढोल / टैंक में 50 लीटर के लगभग पानी डाले , सबसे पहले ढोल में पानी के साथ 10 किलो गाय का गोबर डाले ,

 

गोबर के बाद 10 किलो गोमूत्र भी डाले , इन सब को डालने के बाद सब को अच्छी तरह से पानी में घोल लेना चाहिए , सब को घोलने के बाद इनमे 1 किलो पीपल के निचे की मिटटी भी मिला दे ,

 

इसमें 2 किलो पुराना गुड़ भी डाल दे और 2 किलो बेसन भी ढोल में दाल दे , अब इन सब को अच्छी तरह से घडी की सुई की दिशा में डण्डे की सहायता से हिलाते हुये मिक्स कर ले ,

 

अब 200 लीटर के ढोल को पूरा पानी की सहायता से भर ले और अच्छी तरह डण्डे से मिक्स कर ले , अब ढोल को कपडे से ढक दे , जीवामृत के ढोल को ऐसी जगह रखे जहा हमेशा छाया होनी चाहिये

 

अब डेली इस ड में रखे जीवामृत के घोल को सुबह – शाम लखड़ी के डण्डे की सहायता से घडी की सुई की दिशा में अच्छी तरह हिलाये यह कार्य 7 से 8 दिन तक डेली करना हे

 

8 दिन के लगभग यह बनकर तैयार हो जाता हे 200 लीटर के ईस घोल को हम एक एकड़ भूमि तक काम में ले सकते हे

किसी भी पुराने पेड़, बरगद, पीपल के निचे की 1 किलो मिट्टी भी काम में ले सकते हैं

फलदार पौधों में एक पौधे में 1 लीटर 15 दिन के अंतराल पर डालना चाहिए

 

 

 

 

बोर्ड पेस्ट बनाने का तरीका

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  1. *बोडो पेस्ट*

इसे बनाने के लिए 1 किलो चूना और 1 किलो नीला थोथा यानी कॉपर सल्फेट का प्रयोग करते हैं

 

इन दोनों सामग्रियों को प्लास्टिक के बर्तन में 5 -5 लीटर पानी में अलग-अलग मिलाएंगे नीला थोथा को पोटली बांधकर पानी में भी लटका देना बेहतर होगा दूसरे दिन सुबह दोनों को अलग अलग छानकर तीसरे पात्र में धार मिलाते हुए मिलाएं । 

फिर इसमें लोहे का चाकू डूबा कर देखिए यदि चाकू में तांबा जम जाता है ,तो आपका बोर्डो मिश्रण पूरी तरह से तैयार नहीं है आपको इसे उदासीन करना होगा याने चुने की मात्रा थोड़ी और बढ़ानी होगी इस तरह से जब आप चाकू में तांबा ना जमे तब समझ जाएं बोर्डो मिश्रण तैयार है बोर्डेक्स मिश्रण को जाँच करने की विधि :

 

किसानो को इस बात का ध्यान रखना होगा की बोर्डेक्स मिश्रण में कॉपर की अधिकता नहीं होनी चाहिए  क्योकि यह पौधो के लिए विषाक्त होती है| इस की जाँच के लिए किसान लोहे की कील / चाक़ू को घोल में कुछ समय के लिए डुबोए| किसान को यह ध्यान देना होगा की अगर कॉपर अधिक होगा तो कील / चाक़ू भूरे / लाल रंग का हो जाएगा|  कॉपर अधिक होने की स्थिति में किसान को घोल में चूना और अधिक मिलाना चाहिए, जब तक की चाकू/ कील से भूरा / लाल रंग हट नहीं जाता है| इस की जाँच की लिए किसान बाजार में उपलब्ध पी. एच. पेपर का भी उपयोग कर सकते है|

 

किसान के ध्यान रखने योग्य बातें:

 

किसानो को बोर्डेक्स मिश्रण का घोल तैयार करने के तुरंत बाद ही इसका उपयोग खेत या बगीचे में कर लेना चाहिए|

कॉपर सलफेट का घोल तैयार करते समय किसानो लोहें / गैल्वेनाइज्ड बर्तन को काम में नहीं लेना चाहिए|

किसानो को यह ध्यान रखना हो की वे बोर्डेक्स मिश्रण को किसी अन्य रसायन या पेस्टिसाइड के साथ में इसका इस्तेमाल नहीं करना चाहिए|